घर में ज़्यादा रहते हैं तो ये कई परेशानियों की है जड़

19वीं सदी के स्कॉटिश-अमरीकी जॉन मुइर ने कभी लिखा था, "वनों में आइए क्योंकि आराम यहीं है." वे अमरीकी राष्ट्रीय उद्यानों के एक शुरुआती हिमायती थे.

मुइर ने अपने जीवन का एक बड़ा हिस्सा योसेमाइट और सिएरा नेवादा के राष्ट्रीय उद्यानों की खाक छानते हुए बिताया था. जीवन में स्वास्थ्य लाभ में प्रकृति के योगदान पर अपने विश्वास के बारे में उन्होंने काफी कुछ लिखा था : "हर व्यक्ति को रोटी के साथ-साथ सुंदरता भी चाहिए, खेलने और इबादत के ऐसे स्थान भी चाहिए जहां प्रकृति आपको स्वस्थ रख सके और आपके शरीर के साथ मन को भी ताक़त दे सके."

ऐसा लगता है कि मुइर को इसकी असलियत का भान हो गया था : इस बात के प्रमाण बढ़ते जा रहे हैं कि प्रकृति में समय बिताने से हम और अधिक स्वस्थ और सुखी बनते हैं.

यह एक कुछ ऐसी बात है जिसे लोग सहज रूप से अनुभव कर लेते हैं. लेकिन हम प्रौद्योगिकी से भटके हुए अपने काम में व्यस्त हैं और प्राकृतिक वातावरणों से दूर अक्सर शहरी माहौल में रहते हैं.

हम बहुत ज़्यादा घर से बाहर भी नहीं निकलते हैं : उदाहरण के लिए एक औसत अमरीकी अपने जीवन का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा बंद दरवाजों के पीछे बिताता है.

लेकिन यदि हम प्रतिदिन एक घंटे का समय बाहर बितायें तो क्या बदलाव आएगा? क्या इससे कोई फ़र्क़ पड़ता है कि हम कहां जाते हैं और हमारी व्यस्त दिनचर्या से निकालकर कुछ समय बाहर बिताना जीवन में क्या महत्व रखता है.

बाहर घूमने-फिरने के कुछ फ़ायदे तो बड़े साफ़ हैं. आपको खड़े होकर चलना-फिरना पड़ेगा, ये विशेष रूप से तब लाभकारी है जब आपके दिन का अधिकांश हिस्सा किसी स्क्रीन के सामने बीतता है.

शोध से पता चलता है कि काम से कुछ समय अलग रहने पर काम में आपका मन अधिक लगता है और प्राकृतिक रोशनी में की गई कुछ चहल-कदमी आपको विटामिन डी दे जाती है.

आप जिस तरह के खुले वातावरण में बाहर निकलते हैं वो भी महत्व रखता है : शहर की व्यस्त सड़कों से कहीं अधिक फ़ायदेमंद हरियाली भरे रास्ते या समंदर का किनारा होगा.

अब तक तो सब कुछ अच्छा ही लग रहा है. लेकिन शहरी और प्राकृतिक वातावरण में होने वाली हमारी प्रतिक्रियाओं के बढ़ते हुए तुलनात्मक अध्ययन के आधार पर यह कहा जा सकता है कि आप जिस तरह के खुले वातावरण में बाहर निकलते हैं वो भी महत्व रखता है: शहर की व्यस्त सड़कों से कहीं अधिक फ़ायदेमंद हरियाली भरे रास्ते या समंदर का किनारा होगा.

कनाडा की ट्रेंट यूनिवर्सिटी के मनोविज्ञान विभाग की असोसिएट प्रोफ़ेसर लीजा निस्बत बताती हैं, "शोध आमतौर पर ये बताते हैं कि जब लोग प्राकृतिक वातावरण और प्राकृतिक भू-दृश्यों के सम्पर्क में रहते हैं तो उन्हें तनाव भी कम होता है. जब आप कुदरत की गोद में खेलते हैं तो आपका रक्तचाप भी कम होता है और हृदयगति और मूड यानी मनोदशा बेहतर होती है."

वे आगे बताती हैं कि कुदरत के नजदीक रहने के मनोवैज्ञानिक फ़ायदों पर भी काफ़ी काम किया गया है. आमतौर पर लोग प्रकृति की गोद में प्रसन्न रहते हैं. ख़ुशी एक बहुत व्यापक अवधारणा है और हम सकारात्मक और नकारात्मक भावनाओं से इसके बारे में जानते हैं- लोग कितने जीवंत और ऊर्जा भरे हैं और अपने जीवन में वे कितने संतुष्ट हैं.

वे कहती हैं, "जब लोग प्राकृतिक स्थानों, भले ही वे शहरों में क्यों न हों, में रहते हैं तो सकारात्मक भावनाएं और जीवंतता बंद कमरों की अपेक्षा अधिक होती है."

1980 के दशक से ही यह विचार जोर पकड़ने लगा था कि प्रकृति हम सबके लिए अच्छी होती है. सबसे पहले यह प्रमेय सामने आया कि इंसानों में प्रकृति से जुड़ाव की एक अंदरूनी इच्छा होती है जिसे बायोफीलिया हाइपोथीसिस कहा गया.

इसके बाद जापानी अवधारणा शिनरिन-योकू प्रचलन में आई जिसका अर्थ है वनों के वातावरण को आत्मसात करने से आपको स्वास्थ्य लाभ होता है.

शिनरिन-योकू के शोधकर्ताओं ने बहुत सारे मनोवैज्ञानिक और शरीर क्रिया वैज्ञानिक लाभों की बात कही है जबकि दुनियाभर के अध्ययन ये बताते हैं कि प्रकृति में बिताए गए समय से हमें ध्यान करने की क्षमता में बढ़ोतरी, रचनात्मकता में बढ़ोतरी, अवसाद में कमी और लंबी उम्र का भी फ़ायदा मिलता है.

ये बात सत्य है कि हममें से बहुत सारे लोग शहरों में रहते हैं और जंगलों या प्राकृतिक स्थानों में हमारा आवागमन नहीं होता है. लेकिन निस्बत बताती हैं कि ज़रूरी नहीं कि जंगल में ही जाया जाए- बहुत सारे अध्ययनों में यह प्रमाणित किया गया है कि शहरों में बनाए गए हरे-भरे वातावरण से भी काफ़ी लाभ मिलता है.

यूके की एसेक्स यूनिवर्सिटी के स्कूल ऑप स्पोर्ट, रीहैबिलिटेशन एंड एक्सर्साइज़ साइंसेस के जो बार्टन "ग्रीन एक्सर्साइज़" पर शोध कर रही हैं. इसमें प्रकृति के साथ तालमेल रखते हुए कामकाज करने से स्वास्थ्य पर होने वाले फ़ायदों की जांच की जा रही है. एक अध्ययन में उन्होंने इस बात पर शोध किया कि मानसिक स्वास्थ्य में वृद्धि के लिए प्रकृति में "कितना समय" बिताना ठीक रहेगा.

यदि स्वाभिमान और मनोदशा की बात की जाए तो प्रकृति में बिताए गए पहले पांच मिनट में ही सबसे अधिक सुधार पाया गया.

आपको ऐसा लगेगा कि बाहर जितना समय बिताया जाए उतना बेहतर है. लेकिन 1252 प्रतिभागियों के एक अध्ययन में बार्टन ने पाया कि यदि स्वाभिमान और मनोदशा की बात की जाए तो प्रकृति में बिताए गए पहले पांच मिनट में ही सबसे अधिक सुधार पाया गया.

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